Personality Development in Hindi 2021 व्यक्तित्व के प्रकार और व्यक्तित्व विकास कैसे करें

Personality development in hindi

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Personality development in hindi – व्यक्तित्व साक्षात्कार की सफलता में प्रत्याशी के व्यक्तित्व की प्रमुख भूमिका होती है। प्रायः यह देखा जाता है कि प्रत्याशी अपने विषय से सम्बन्धित पुस्तकों, सामान्य ज्ञान आदि के अध्ययन पर ही ध्यान केन्द्रित रखते हैं।

अपने व्यक्तित्व विकास की ओर पर्याप्त रूप से ध्यान नहीं देते. जबकि प्रत्याशी का व्यक्तित्व अन्तिम रूप से किसी पद पर चयन होने में बौद्धिक क्षमता एवं विषय-ज्ञान के समान ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सर्वमान्य सत्य है कि प्रत्याशी द्वारा साक्षात्कार के समय स्वयं को प्रस्तुत करने का प्रभावशाली ढंग ही साक्षात्कार में सफलता दिलाता है।

Personality development in hindi

व्यक्तित्व (Personality) क्या है

व्यक्तित्व क्या है?Personality व्यक्तित्व को किसी एक परिभाषा में बाँधना कठिन कार्य है। यह व्यक्ति के विचारो, भावनाओं, व्यवहार, दृष्टिकोण, पहनावा आदि का एक ऐसा अद्भुत संगम होता है, जो अन्य लोगों के साथ उसकी अन्तः क्रिया के समय स्पष्ट रूप से झलकता है। व्यक्तित्व में पैतृक रूप से प्राप्त व्यावहारिक गुणों के साथ-साथ अर्जित व्यावहारिक गुण भी सम्मिलित रहते हैं। इन्हीं गुणों के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति दूसरे से अलग पहचाना जाता है।

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साक्षात्कार मण्डल द्वारा प्रत्याशी के व्यक्तित्व का मूल्यांकन कुछ विशेष मापदण्डों के आधार पर किया जाता है। जो प्रत्याशी इन मापदण्डों पर खरे उतरते हैं, वे ही साक्षात्कार में सफल होते हैं। अतः प्रत्याशियों को इन मापदण्डों के अनुसार अपने व्यक्तित्व का विकास करना चाहिए।

व्यक्तित्व के प्रकार – Personality development in hindi

  1. खुली व्यक्तित्व
  2. बंद व्यक्तित्व
  3. छुपा व्यक्तित्व
  4. अँधेरे व्यक्तित्व

व्यक्तित्व विकास – Personality development in hindi

1- नेतृत्व का गुण Leadership Quality

नेतृत्व किसी भी मानवीय क्रियाकलाप की सफलता के लिए मूलभूत आवश्यकता है। नेतृत्व वह कला या प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति किसी समूह के लोगों को लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करता है। नेतृत्व के लिए व्यक्ति में
ऊर्जा, लोगों को समझने और उन्हें प्रोत्साहित करने की योग्यता, नेता के समान आगे बढ़कर कार्य करने की योग्यता जैसे गुणों का होना आवश्यक है। साक्षात्कार में सफलता हेतु प्रत्याशी में नेतृत्व सम्बन्धी निम्नलिखित गुण होने अनिवार्य हैं.

(I) समूह को प्रभावित करने की क्षमता Ability to Influence on the Group- Personality development in hindi

जीवन में सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि लोगों के विचारों को हम अपने अनुरूप किस सीमा तक परिवर्तित कर सकते हैं। लोगों के व्यवहार की दिशा अपने अनुसार निश्चित करना एक कठिन चुनौती है, जिसका हम बहुधा अपने दैनिक जीवन में सामना करते हैं। समूह के व्यवहार परिवर्तन की बात तो दूर, अपने परिवार के ही किसी सदस्य के व्यवहार को अपने अनुसार परिवर्तित करना कठिन होता है। परन्तु एक नेता में यह गुण होना चाहिए कि वह लोगों की सोच को सही दिशा में परिवर्तित कर सके। वकील, राजनेता, उपदेशक इस कला में निपुण होते हैं और वे सरलता से लोगों को अपने विचारों या दर्शन के प्रवाह में बहा ले जाते हैं। गाँधीजी में लोगों के विचारों को अपने अनुरूप ढालने की चमत्कारिक क्षमता थी। इसी कारण देशवासी उनकी एक आवाज पर उनके पीछे चल पड़ते थे।

(ii) पहल करने की योग्यता Ability to initiate

साक्षात्कार मण्डल प्रत्याशी की पहल करने की योग्यता का आकलन करता है। वह निरीक्षण करता है कि प्रत्याशी में किसी कार्य को अपनी ओर से प्रारम्भ करने की क्षमता है अथवा नहीं। प्रत्याशी नई-नई परिस्थितियों में सामान्य रूप से कार्य करने के योग्य है अथवा नहीं।

प्रायः व्यक्ति के जीवन में अचानक ऐसी समस्याएँ आ खड़ी होती हैं, जिनसे न तो वह पूर्व-परिचित होता है और न ही उसे उन समस्याओं से निपटने का अनुभव होता है। ऐसे समय में यदि कोई व्यक्ति समस्या के समाधान हेतु स्वयं ही उपाय खोजकर लक्ष्य-प्राप्ति हेतु कार्य प्रारम्भ कर देता है तो कहा जाता है कि उसमें पहल करने की क्षमता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति समस्या उत्पन्न होने पर दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा करता है, उसमें पहल करने की क्षमता नहीं होती। जिन लोगों में पहल करने की उच्च क्षमता होती है, वे नया व उपयुक्त कदम उठाकर किसी समस्या अथवा कठिन परिस्थिति का सफलतापूर्वक सामना कर लेते हैं।

पहल की योग्यता एक अर्जित गुण है जो कि अनुकूल वातावरण में विकसित होता है। बाल्यकाल में इस प्रकार का वातावरण उपलब्ध कराना माता-पिता और अध्यापकों का दायित्व होता है। वे बच्चों में पहल करने की योग्यता की वृद्धि और विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे इस योग्यता को विकसित अथवा अवरुद्ध कर सकते हैं। किसी समस्या के आने पर बच्चों को सोच-विचार करने का अवसर न देकर स्वयं उसकी निराकरण कर देना उसकी पहल की योग्यता के विकास को अवरुद्ध करना है। बच्चों पर किसी कार्य को करने का स्वतन्त्र भार डालने से उनकी पहल की योग्यता का विकास होता है। प्रोत्साहन और प्रशंसा भी इस गुण के विकास में सहायक हैं। प्रत्याशियों के लिए यह आवश्यक है कि वे झिझक का त्याग करके दिन-प्रतिदिन के जीवन में प्रत्येक कार्य में पहल करने की आदत डालने का प्रयास करें।

(ii) साहस Courage

साहस नेतृत्व का प्रमुख गुण है। साहसी व्यक्ति ही किसी समूह का सफल नेतृत्व कर सकता
है। जो व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थतियों से घबराकर साहस खो देता है वह नेतृत्व नहीं कर
सकता। साक्षात्कार मण्डल, प्रत्याशी में साहस का परीक्षण करने के प्रश्न करके यह देखता
है कि प्रतिकूल परिस्थिति से घबराकर प्रत्याशी कहीं साहस तो नहीं खो देता।

अतः यह आवश्यक है कि प्रत्याशी अपने अन्दर साहस को विकसित करें। विद्यालय स्तर पर
स्काउट-गाइड, एनसीसी, ट्रैक एण्ड फील्ड, पर्वतारोहण आदि द्वारा विद्यार्थियों में साहस का
गुण विकसित होता है। प्रत्याशी साहसिक कार्यों से सम्बन्धित कथाएँ
पढ़ें,खेलकूद,पर्वतारोहण आदि कार्यों में भाग लेने का प्रयास करें। साक्षात्कारकर्ता के प्रश्न
को ध्यानपूर्वक सुनें। फिर सोचें, विचारों को क्रमबद्ध करें, तब उत्तर दें।

(iv) चातुर्य एवं अनुकूलता Tact and Adaptability

परिस्थितियों के अनुसार दक्षतापूर्ण प्रबन्ध करना एवं कुशलतापूर्वक कार्य करना चातुर्य
कहलाता है। एक बुद्धिमान व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी अपनी चतुरता से सहज बना
रहता है। वह सभी लोगों की भावनाओं का सम्मान करता है और दक्षता के साथ अपने कार्य
में संलग्न रहता है। वह सभी तरह के स्वभाव वाले व्यक्तियों के साथ सरलता से कार्य कर
लेता है। उसमें अन्य लोगों की भावनाओं को समझने की योग्यता होती है। वह जानबूझकर
किसी को ठेस नहीं पहुँचाता। उसके सभी कार्यों से चतुराई झलकती है। साक्षात्कारकर्ता
प्रत्याशी के चातुर्य का आकलन भी करते हैं। जो प्रत्याशी साक्षात्कार मण्डल के सामने
चातुर्य का प्रदर्शन करते हैं, वे अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रहते हैं।

कुछ लोग अपने दैनिक जीवन में कोई समस्या या बाधा आ जाने पर दुःखी हो उठते हैं, कुछ
लोग अपनी योजना के असफल रहने पर सन्तुलन खो देते हैं। कुछ पुरातनपन्थी और लकीर
के फकीर होते हैं, उनके लिए किसी परिवर्तन को स्वीकार करना कठिन होता है। इस प्रकार
के लोगों में अनुकूलता’ जैसे गुण का अभाव होता है।

अनुकूलता वास्तव में एक प्रकार की मानसिक योग्यता है जो किसी व्यक्ति के दृष्टिकोण एवं वैचारिक प्रक्रिया पर निर्भर होती है। इसके रहते व्यक्ति बदले हुए वातावरण के अनुसार स्वयं को शीघ्र ही ढाल लेता है।

जिज्ञासु एवं खुले विचारों वाला व्यक्ति कूपमण्डूक और साहसहीन व्यक्ति की अपेक्षा शीघ्र ही स्वयं
को नए वातावरण के अनुकूल बना लेता है। प्रत्याशियों को अपने विचारों को लचीला रखना
चाहिए और स्वयं को सभी प्रकार के वातावरण में ढाल लेने की सोच विकसित करनी चाहिए।

(v) तनावपूर्ण स्थिति में शान्त रहना Remaining Cool Under Stressful Situation

यदि कोई व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों में अपनी भावनाओं पर नियन्त्रण नहीं रख पाता तो
वह अपनी क्षमताओं एवं योग्यताओं का उचित उपयोग नहीं कर पाता। तनाव व्यक्ति के
शरीर एवं मस्तिष्क को अनेक प्रकार से प्रभावित करता है। यह शारीरिक क्षमता को कम
करता है। विवेक और बुद्धि को कुंठित करता है। यह अकारण भय, थकान, चिड़चिड़ापन,
अलगाव, अवसाद और भावनात्मक अस्थिरता उत्पन्न करता है। इन प्रतिकूलताओं से बचने के लिए शरीर व मस्तिष्क का सन्तुलन बनाए रखना आवश्यक है। प्रत्याशियों तनाव के कारणों को खोजकर उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए और सदैव शान्त चित्त रहना चाहिए।

(vi) कर्त्तव्य एवं दायित्व बोध Sense of Duty and Responsibility

साधारण हो अथवा कठिन या जोखिमपूर्ण, उसे सदैव ही कर्त्तव्य बोध की भावना से करना
कर्तव्य बोध से तात्पर्य सौंपे गए कार्यों का ईमानदारी एवं स्थिरचित्त से करने से है। कार्य चाहे,
चाहिए। कार्य के प्रति निष्ठा एवं ईमानदारी का भाव व्यक्ति में उपस्थित कर्तव्य बोध पर
निर्भर करता है, जिस व्यक्ति में कर्त्तव्य बोध होता है, वह ईमानदारी से कार्य करता है।

दायित्व बोध नेतृत्व का सामान्य गुण है और यह उससे गहनता से जुड़ा है। कर्तव्य एवं
दायित्व बोध के सन्दर्भ में व्यक्ति के अन्दर कुछ गुणो का होना आवश्यक है; जैसे- कर्तव्य
के महत्त्व की गहन समझ, सामाजिक नियमो एवं व्यवहार की समझ, मानवीय भावनाओं की
समझ, क्रिया एवं प्रतिक्रिया की समझ इत्यादि। कर्त्तव्य एवं दायित्व बोध मनुष्य के प्रमुख
चारित्रिक गुण हैं। सफल नेतृत्व के लिए चरित्र में इन दोनों का होना आवश्यक है। नैतिक
शिक्षा सम्बन्धी एवं महान् व्यक्तियों से सम्बन्धित साहित्य, नागरिकशास्त्र आदि का अध्ययन
करने से कर्तव्य एवं दायित्व बोध का विकास होता है।

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(vii) आत्मविश्वास Self Confidence

आत्मविश्वास को ‘सफलता की कुञ्जी’ कहा जाता है। आत्मविश्वास के बल पर व्यक्ति
कठिन-से-कठिन परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना सकता है। आत्मविश्वास व्यक्तित्व
निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह व्यक्तित्व के अन्य गुणों के साथ मिलकर
आपके प्रदर्शन को प्रभावशाली बनाता है। जब आप अपने अन्दर इस गुण का विकास कर
लेते हैं तो आप स्वयं पर अधिक विश्वास करने लगते हैं, आपके अन्दर आत्म-स्वीकृति का
भाव उत्पन्न होता है और आप अपनी सफलता के प्रति विश्वास से भर जाते हैं।

आत्मविश्वास बढ़ाने का सबसे सरल तरीका महान् व्यक्तियों; जैसे-महात्मा गाँधी,
सुभाषचन्द्र बोस जैसे लोगों की जीवनियाँ पढ़नी चाहिए। स्वेट मार्डन की पुस्तकें
जैसे-सफलता की कुञ्जी आदि का अध्ययन भी उपयोगी है।

जब आप आत्मविश्वास से भर जाते हैं तो आपके अन्दर उपस्थित भय, आशंका, आत्महीनता
जैसे नकारात्मक तत्त्व समाप्त हो जाते हैं और आप स्वयं को क्षमतावान व समर्थ अनुभव करने
लगते हैं। जिस व्यक्ति में अपनी शक्तियों को पहचान कर उनके उचित उपयोग की समझ
उत्पन्न हो जाती है, वह अपने प्रत्येक कार्य में उनका उपयोग कर सकता है।

2- संचार-कौशल Communication Skill – Personality development in hindi

संचार सभी मानवीय क्रियाओं का मूल तत्त्व है। संचार के अभाव में हम स्वयं को अभिव्यक्त
नहीं कर सकते। संचार-कुशलता के अभाव में साक्षात्कार की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
साक्षात्कारकर्ता प्रत्याशी से अच्छे संचार-कौशल की अपेक्षा रखता है। प्रत्याशी में एकाग्रता से सुनने, समझने और स्पष्ट उच्चारण में साथ प्रत्युत्तर देने की क्षमता होनी चाहिए। यदि हम दैनिक
जीवन में ही देखें तो पाएंगे कि संचार की सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक या घरेलू सभी मानवीय
क्रियाओं में विशेष भूमिका है। यदि किसी परिवार के सदस्यों में भी भली प्रकार संचार न हो तो
अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। सामान्यतः माना जाता है कि किसी भी संस्थान के प्रबन्धक
अपने 75% से अधिक समय का उपयोग संचार और उससे सम्बन्धित क्रिया-कलापों में करते हैं।
इस प्रकार संचार प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अभिन्न अंग है।

जिस संगठन के अधिकारी व कर्मचारी संचार-कुशलता से युक्त होते हैं, वह तीव्र गति से
प्रगति करता है और अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। संचार कार्यक्रम नियोजन एवं संगठन या
विभाग के लोगों के मध्य बेहतर समझ सुनिश्चित करता है।

संचार के माध्यम से हम विभिन्न विभागों और किसी भी संगठन के सदस्यों के बीच सकारात्मक
सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं। मौखिक, लिखित, श्रवण, पठन, अन्तवैयक्तिगत संचार के विभिन्न
रूप हैं। संचार में केवल एक ही सूचना का संचार नहीं होता बल्कि इसके माध्यम से अनेक सूचनाएँ
एक साथ संचरित होती हैं। इस प्रकार यह अनेक प्रकार से व्यवहार परिवर्तन में भूमिका का निर्वाह
करता है। संचार कौशल में वृद्धि के लिए संचार के तत्त्वों का ज्ञान होना आवश्यक है।

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सफल संचार के लिए निम्नलिखित तत्त्व उत्तरदायी होते हैं

  • संचार का पहला तत्त्व स्वयं संचारकर्ता (Messenger) और उसका व्यक्तित्व होता है।
    संचारकर्ता जो बात कहना चाहता है यदि उसे भली प्रकार संचरित नहीं कर पाता तो उसका
    संचार असफल हो जाता है। प्रभावी संचार के लिए विश्वास एक प्रमुख कारक है। जो लोग
    आपस में विश्वास नहीं रखते, वे एक-दूसरे तक प्रभावी संचार नहीं कर पाते।
  • संचार का दूसरा तत्त्व उसमें सम्प्रेषित किया जाने वाला सन्देश (Message) है। संचार का
    उद्देश्य विचार विनिमय, क्रियान्वयन, आपसी समझ उत्पन्न करना, व्यवहार में परिवर्तन
    लाना अथवा किसी लक्ष्य को प्राप्त करना होता है।
  • संचार का तीसरा तत्त्व संचार के उपरान्त लोगों की प्रतिक्रिया (Response) देखना होता है
    अर्थात् जो बात संचरित की गई, उसका लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा अथवा लोगों ने उसे किस
    रूप में लिया। सामान्यत: किसी व्यक्ति की प्रतिक्रिया उसकी अपनी परिस्थितियों, अपेक्षाओं,
    महत्त्वाकांक्षाओं, जीवन स्तर, मानसिक स्तर, शिक्षा, प्रशिक्षण, अनुभव आदि पर निर्भर
    करती है। संचारकर्ता को इन सभी तत्त्वों को ध्यान में रखते हुए अपने संचार कार्यक्रम का
    ढाँचा तैयार करना चाहिए, तभी वह प्रभावी संचार करने में सफल हो सकता है।
  • संचार का चौथा पहलू संचार के लिए उपयोग में लाए जाने वाले साधन से सम्बन्धित है।
    संचार के अनेक साधन हो सकते हैं; जैसे-दृश्य-श्रव्य साधन, व्यक्तिगत रूप से बातचीत
    करना, लिखित सामग्री का प्रयोग करना आदि।
  • संचार का पाँचवाँ तत्त्व है-परिस्थितियाँ। इसके अन्तर्गत भौतिक, मनोवैज्ञानिक और काल
    सम्बन्धी परिस्थितियाँ सम्मिलित होती है। प्रभावी संचार के लिए इन तत्त्वों पर विचार किया
    जाता है।

साक्षात्कार देने वाले प्रत्याशी में संचार सम्बन्धी निम्नलिखित कौशलों का होना अनिवार्य है.

(i) भाषा Language

भाषा संचार का एक प्रमुख तत्व है। भाषा के अभाव में संचार नहीं किया जा सकता। प्रत्याशी को साक्षात्कार मण्डल समक्ष सरल, सहज एवं सम्प्रेषणीय भाषा का प्रयोग करना चाहिए। शब्दों
का उच्चारण शुद्ध हो, शब्द क्लिष्ट न हो। भाषा में सुधार के लिए प्रत्याशी रेडियो पर समाचार,
वार्ताए, परिचर्चाएँ सुनें। साथ ही किसी समाचार-पत्र की कुछ पंक्तियाँ जोर-जोर से बोलकर
अभ्यास करें। इससे भाषा के साथ-साथ संचार-कौशल में भी वृद्धि होगी।

(ii) स्वर और शैली voice and Style

प्रत्याशी को साक्षात्कार मण्डल से मृदु स्वर में वार्तालाप करना चाहिए। तेज स्वर में बोलना
अथवा कुछ विशेष शब्दों पर अत्यधिक जोर देकर बोलना या कुछ शब्दों का उच्चारण
अत्यन्त धीमे स्वर में करना उचित नहीं होता। प्रश्नों के उत्तर सदैव सधे हुए स्वर में देश
चाहिए। वार्तालाप में उतार-चढ़ाव, विराम आदि का ध्यान रखने पर साक्षात्कारमण्डल के
सामने अपनी बात प्रभावशाली ढंग से रखी जा सकती है।

(iii) अभिव्यक्ति की क्षमता Power of Expression

साक्षात्कार में सफलता प्राप्त करने के लिए प्रत्याशी में स्वयं को अभिव्यक्त करने की क्षमता
होनी चाहिए। जो प्रत्याशी अपने भावों को कुशलता से अभिव्यक्त कर देते हैं, वे साक्षात्कार
में सफल हो जाते हैं। प्रत्याशियों को अपने भावों को कुशलतापूर्वक अभिव्यक्त करने का
अभ्यास करना चाहिए। इसके लिए अपने साथियों के साथ विभिन्न विषयों पर परिचर्चा
करनी चाहिए और किसी चुने गए विषय पर सबके सामने विचार व्यक्त करने का अभ्यास
करना चाहिए। जो त्रुटियाँ हों, उनमें सुधार लाना चाहिए।

(iv) स्वर की स्पष्टता Clarity of Speech

प्रत्याशी अपने मनोभावों का कुशलतापूर्वक संचार तभी कर सकते हैं, जब वे किसी भी बात को
स्पष्ट स्वर में व्यक्त करें। प्रत्याशी इस बात का विशेष ध्यान रखें कि वे जो भी बात बोलें स्पष्टता
के साथ बोलें ताकि साक्षात्कार मण्डल का प्रत्येक सदस्य पूछे गए प्रश्न के उत्तर को समझ सके
और ठीक-ठीक मूल्यांकन कर सके। कुछ लोग बात करते समय वाक्य के अन्तिम शब्द या
बीच-बीच में अन्य शब्दों को बोलने में अत्यधिक शीघ्रता करते हैं, जिससे वाक्य का
आधा-अधूरा अर्थ समझ आता है और प्रत्याशी के प्रदर्शन का उचित मूल्यांकन नहीं हो पाता।
अतः साक्षात्कार के समय प्रत्याशियों को स्पष्ट स्वर में अपनी बात कहनी चाहिए।

3- बाह्य व्यक्तित्व Appearance – Personality development in hindi

इसके अन्तर्गत प्रत्याशी के बाह्य व्यक्तित्व सम्बन्धी सभी तत्त्व सम्मिलित रहते हैं। प्रत्याशी
अपने बाह्य व्यक्तित्व को आकर्षक बनाकर साक्षात्कार मण्डल पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता
है।

बाह्य व्यक्तित्व में शरीर की बाह्य बनावट, कपड़े, चेहरे के हाव-भाव, खड़े होने, उठने-बैठने का ढंग, शिष्टाचार, चुस्ती-फुर्ती आदि तत्त्व सम्मिलित रहते हैं। अनेक बार हमें ऐसे लोग मिलते
हैं जो हमें एक ही झलक में अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। बाह्य व्यक्तित्व को आकर्षक बनाए
रखना अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि साक्षात्कारमण्डल पर यह स्थाई प्रभाव डालता है।

4- बौद्धिक क्षमता Intelligence – Personality development in hindi

ज्ञान का सही और तर्कपूर्ण उपयोग करना ही बौद्धिक क्षमता है। बौद्धिक क्षमता का विकास
दिन-प्रतिदिन के अनुभवों से होता है। यद्यपि प्रत्याशी की बौद्धिक क्षमता का परीक्षण लिखित परीक्षा के माध्यम से ही हो जाता है फिर भी इसका आकलन साक्षात्कार प्रक्रिया द्वारा भी किया जाता है। इसलिए प्रत्याशी को अपने विषय एवं सामान्य ज्ञान की गहन जानकारी होनी चाहिए। साक्षात्कार में जाने से पूर्व उसे अपने वैकल्पिक विषयों के मूल सिद्धान्तों को भली प्रकार से समझ लेना चाहिए।

अपने विचारों और दृष्टिकोण पर दृढ़ रहे।
विचार तार्किक और विश्लेषणात्मक हों।


विषय सम्बन्धी जानकारी के साथ-साथ प्रत्याशियों को समसामयिक राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय
घटनाक्रमों पर भी पैनी नजर रखनी चाहिए। साक्षात्कारमण्डल रोजगार की खोज में लगे हुए
प्रत्याशी से अच्छे सामान्य ज्ञान की अपेक्षा करता है।

प्राय: साक्षात्कार के समय प्रत्याशी की विश्लेषण एवं निर्णय क्षमता को परख करने के लिए उससे किसी राजनैतिक अथवा आर्थिक समस्या को हल करने के उपाय पूछे जाते हैं। इस तरह के प्रश्नों का कोई भी सीधा-सपाट उत्तर नहीं होता। ऐसे प्रश्नों के लिए यह महत्त्वपूर्ण होता है कि प्रत्याशी ने समस्या का विश्लेषण किस प्रकार किया और किस रूप में किया है। प्रत्याशी द्वारा समस्या के सन्दर्भ में किए गए विश्लेषण और उसके हल के लिए सुझाए गए निर्णय एवं उत्तर के प्रस्तुतीकरण का महत्त्व होता है।

5- ग्रहणशीलता Adaptability – Personality development in hindi

साक्षात्कार में ग्रहणशीलता का विशेष महत्त्व है। एक चतुर प्रत्याशी वार्तालाप के विषय में
रुचि लेता है, उस पर पूर्ण ध्यान देता है और शीघ्रता से विषय को समझ लेता है; जबकि जिस
प्रत्याशी में ग्रहणशीलता का अभाव होता है, वह विषय को देर से समझ पाता है। इस प्रकार
अलग-अलग लोगों की समझ और उनकी ग्रहणशीलता भी अलग-अलग होती है। प्रत्याशी
अध्ययन, मनन और एकाग्रता का अभ्यास करके अपनी ग्रहणशीलता में वृद्धि कर सकते हैं और
साक्षात्कार में श्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकते हैं।

6- निर्णय क्षमता Decision Capacity

प्रत्येक व्यक्ति अपने मस्तिष्क द्वारा लिए गए निर्णय के अनुसार कार्य करता है। मस्तिष्क
द्वारा कार्य करने का निर्णय लिए जाने के पश्चात् ही व्यक्ति कार्य आरम्भ करता है। सही समय पर
लिया गया सही निर्णय ही लाभकारी होता है। आपात स्थिति में सही समय पर सही निर्णय लेने का
बहुत महत्त्व है।

एक नेतृत्वकर्ता में शीघ्र एवं सही निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए। वर्तमान में जब हर
स्तर पर शक्तियों का विकेन्द्रीकरण हो रहा है, तब एक नेता में शीघ्र एवं सही निर्णय लेने का गुण
अवश्य ही होना चाहिए।

सभी नौकरियों में कुछ अवसर ऐसे आते हैं जब एक कनिष्ठ अधिकारी को स्वतन्त्र रूप से
कार्य करना पड़ता है। नए कार्यभार को सम्भालते समय उसके समक्ष कुछ नवीन और अपरिचित
समस्याएँ आ खड़ी होती हैं। इस समय यदि वह निर्णय लेने में अधिक समय लगा देता है या सही
निर्णय नहीं ले पाता तो वह अपने दायित्व का निर्वाह ठीक प्रकार से नहीं कर पाता है। इसलिए उसे
सही समय पर सही निर्णय लेना चाहिए।

साक्षात्कारमण्डल प्रत्याशी से विविध प्रकार के प्रश्न करके उसकी निर्णय क्षमता का आकलन करता है। इस प्रकार के प्रश्नों को समझने के लिए प्रत्याशियों को नियमित रूप से पूर्व सफल प्रत्याशियों के साक्षात्कार पढ़ने चाहिए।

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आशावादी दृष्टिकोण, समर्पण, दृढनिश्चय
और अभ्यास से ही सफलता मिलती है।

7- सामाजिकता Sociality


व्यक्ति का किसी भी स्तर पर किसी भी प्रकार का प्रदर्शन इस बात पर निर्भर करता है कि
उसका सामाजिक पर्यावरण कैसा है? अच्छे प्रदर्शन हेतु उसे अपने आस-पास के समाज के
साथ तारतम्य बैठाकर चलना पड़ता है। उसे अपने अन्दर सामाजिकता का विकास करना पड़ता है।मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।

वह जीवन के हर कदम पर अन्य मनुष्यों के साथ कार्य-व्यापार करता है। जन्म से ही बालक
अपने आस-पास जिन लोगों को देखता है, उनसे जुड़ा रहता है; जैसे–माता-पिता, मित्र,
अध्यापक इत्यादि। आयु बढ़ने के साथ-साथ मनुष्य के सामाजिक सम्बन्धों का दायरा बढ़ता जाता
है। इसी से उसके अन्दर सहकारिता, टीम भावना और शिष्टाचार का विकास होता है

(i) सहकारिता Cooperation

सहकारिता का अर्थ होता है मिल-जुलकर कार्य करना। यह सामाजिकता का मूलभूत गुण
है। जब भी कुछ लोग एक ही लक्ष्य को पाना चाहते हैं तो वे अपने प्रयासों और संसाधनों को
संयुक्त कर एक टीम के रूप में कार्य करते हैं। यद्यपि उनकी योग्यताएँ एवं क्षमता समान
नहीं होती हैं, पर वे एक ही लक्ष्य-प्राप्ति के लिए कार्य करते हैं और प्राप्त होने वाले लाभ में
समान रूप से सहभागी होते है। किसी भी संगठन में सहजता से कार्य करने के लिए व्यक्ति
में सहकारिता का भाव होना आवश्यक है। इसी सहकारिता से संगठन की उत्पादकता बढ़ती
है और इच्छित लक्ष्य प्राप्त हो जाता है। प्रत्याशी को अपने अन्दर मिल-जुलकर कार्य करने
की भावना का विकास करना चाहिए।

(ii) टीम भावना Team Spirit

यह व्यक्ति का वह गुण है जो सहकारिता के साथ जुड़ा होता है। यह एक-दूसरे से जुड़कर
कार्य करने की भावना है। व्यक्तियों का वह समूह, जो एक ही उद्देश्य की प्राप्ति के लिए
साथ मिलकर कार्य करता है, संगठन कहलाता है। इसलिए समूह के प्रत्येक व्यक्ति में टीम
भावना होनी चाहिए। टीम भावना का तात्पर्य टीम के प्रत्येक सदस्य के मन में टीम के प्रति
निष्ठा की भावना से है। यह वह गुण है जो किसी देश या संगठन को मजबूत बनाता है। उसके
विकास को गति देता है। वह संगठन जिसके कर्मचारी कार्य में व्यक्तिगत रूप से रुचि लेते हैं
और निर्धारित लक्ष्यों का आदर करते हैं वे सदैव सफल रहते हैं। ऐसे लोग दूसरों के लिए
कार्य करने की भावना से सदा ओत-प्रोत रहते हैं और अपने संगठन के लिए स्वयं को पूर्णतः
समर्पित कर देते हैं। यही किसी संगठन की सफलता की कुञ्जी है। विभिन्न प्रकार के
खेलकूद और सामूहिक कार्य टीम भावना के विकास में सहायक होते हैं।

(iii) शिष्टाचार Manners

शिष्टाचार का सामान्य अर्थ होता है-दूसरों के साथ व्यवहार का श्रेष्ठ ढंग। हम सभी एक
सामाजिक प्राणी हैं। समाज में एक नागरिक के लिए व्यवहार करने के जो नियम निर्धारित
किए जाते हैं, वही शिष्टाचार कहलाते हैं। प्रत्याशियों को साक्षात्कार के समय अपने शिष्ट
आचरण का प्रदर्शन करना चाहिए। शिष्टाचार के विकास के लिए व्यक्तित्व में विनम्रता,
अनुशासन और दूसरों के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप न करना जैसे गुणों का विकास
करना चाहिए। जब कोई अधिकारी या कर्मचारी अपने कार्यालय में सभी लोगों के साथ शिष्ट
व्यवहार करता है तो वह सबका प्रिय बन जाता है। उसके कार्यों में सभी सह-कर्मचारी
सहयोग देते हैं, जिससे वह सफलतापूर्वक अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।

मानसिक सतर्कता Mental Alertness Personality development in hindi

साक्षात्कार में उपस्थित होने वाले प्रत्याशियों के लिए मानसिक सतर्कता अत्यन्त आवश्यक
है। मानसिक रूप से सतर्क प्रत्याशी साक्षात्कारमण्डल के प्रश्नों को भली-भाँति समझकर उनका
सटीक उत्तर दे सकता है। मानसिक सतर्कता का विकास और वृद्धि के लिए प्रत्याशियों को दूसरों
की बात को ध्यानपूर्वक सुनने की आदत डालनी चाहिए। ध्यान (Meditation) करने से भी
मानसिक सतर्कता में वृद्धि की जा सकती है।

साक्षात्कारमण्डल आपकी मानसिक सतर्कता परखने के लिए कई प्रकार के प्रश्न कर सकता
है; जैसे—कोई अटपटा प्रश्न कर देना, कोई व्यावहारिक समस्या उत्पन्न करना अथवा कोई छद्म
टिप्पणी करना इत्यादि। प्रत्याशियों को इस तरह के प्रश्नों से विचलित नहीं होना चाहिए बल्कि
विचारपूर्वक सहज भाव से उत्तर देना चाहिए। यह बात सदैव अपने मन में रखें कि
साक्षात्कारमण्डल के सदस्यों का उद्देश्य आपको हताश अथवा निराश करना नहीं होता और न
ही वे आपका उपहास उड़ाना चाहते हैं। वे केवल यह परीक्षण करना चाहते हैं कि जिस पद के लिए
आप साक्षात्कार दे रहे हैं आप उसके लिए उपयुक्त हैं या नहीं, चयनित होने पर आप अपने
दायित्वों का निर्वाह कर पाएँगे या नहीं।

9- दृष्टिकोण की स्थिरता Consistency of Approach


भावुकता जीवन का कोई भी क्षेत्र हो, दृष्टिकोण की स्थिरता अनिवार्य है। व्यक्ति की सफलता दी
बात पर निर्भर करती है कि उसका दृष्टिकोण किस सीमा तक स्थिर है। प्रत्याशी को अपने लिया
का एक दृष्टिकोण बनाना चाहिए, उसमें अति भावुकता आदि का स्थान नहीं होना चाहिए।
क्षणों में भी दृष्टिकोण को स्थिर रखना चाहिए क्योंकि मन की अस्थिरता से लाया
साक्षात्कार से सम्बन्धित पद के लिए यदि आपको चुन लिया गया तो आप स्थिरतापूर्वक
प्राप्ति में बाधा पहुँचती है। साक्षात्कारमण्डल के समक्ष आप यह भी दशनि का प्रयास को नि
दायित्वों का निर्वाह करेंगे। यह बात उल्लेखनीय है कि साक्षात्कारकर्ता प्रारम्भ में पूछे गए प्रश्न
दोहरा भी सकते हैं। आपको भ्रमित करने के लिए और आपके दृष्टिकोण की स्थिरता को परखने के लिए प्रश्नों को घुमा-फिराकर पूछ सकते हैं। अत: साक्षात्कार के प्रारम्भ से अन्त तक कि
विषय पर समान दृष्टिकोण बनाए रखें और उसे सटीक तर्क द्वारा साक्षात्कारकर्ता के बार
प्रस्तुत करें।

10- विचारों की सम्बद्धता Coherence of Thoughts – Personality development in hindi

मानसिक सतर्कता, दृष्टिकोण की स्थिरता और विचारों की सम्बद्धता, ये तीनों ही परस्य
सम्बन्धित गुण इन तीनों को एक-दूसरे के सन्दर्भ में इस प्रकार आंका जाता है कि आपके
व्यक्तित्व में इन तीनों का व्यावहारिक रूप में सन्तुलित सम्मिश्रण है अथवा नहीं। किसी भी विषय
परिस्थिति या समस्या पर आपका दृष्टिकोण तर्क पर आधारित और विचारों की एकरूपता से युक्त
होना चाहिए अन्यथा आपके विचार अस्थिर होंगे जिसके फलस्वरूप साक्षात्कारमण्डल पर आर
अच्छा प्रभाव नहीं छोड़ पाएँगे। यह बात सर्वमान्य है कि एक स्पष्ट दृष्टि रखने वाले व्यक्ति का
मस्तिष्क ही विचारों की सुसम्बद्ध शृंखला रख सकता है और उसे अभिव्यक्त कर सकता है। अगर
प्रत्याशी अध्यावसाय द्वारा अपने सभी विचारों को सुसम्बद्ध रूप में प्रस्तुत करने की योग्यता का
विकास करें।

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